मुन्नी तेरी मोरनी को मोर ले गया, बाकी जो बचा था काला चोर ले गया
यह फ़िल्मी गीत सुनकर लगता है कि कितने वर्षों बाद इसका अर्थ सामने आया । कवि का आशय है क्या था परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखें तो लगता है कि हमारे देश को शकों, हूणों, खिलज़ियों, मुग़लों, चंगेज़खानों, तैमूरलंगों, ग़ज़नबियों तथा नादिरशाहों ने तो पूर्व में लूटा ही, और जो बाकी बचा था, वह इन कालेचोरों अर्थात कालाधन चुराकर विदेश भेजनेवालों ने लूट लिया । इन काले चोरों ने देश की जनता का धन लूटकर उन्हें गरीब बना दिया है, और खुद मालामाल हो गए हैं । वोट लेने के समय उसमें से कुछ गरीबों में बाँटकर फिर उनसे वोटॊं का सौदा कर लेते हैं, और कुर्सी पाकर लूट करने लगते हैं । इस लूट का काला धन विदेश भेज देते हैं । इन्हें कालाचोर कहें, वोटॊं के सौदागर कहें, तैमूरलंग, चंगेज़खाँ के उत्तराधिकारी कहें या कुछ और । इन्हें किसी दायरे में नहीं बाँधा जा सकता । ये बडे कुटिल हैं, और जो इन पर उँगली उठाता है, उसके हाथ काटने के लिये ये तत्पर हो जाते हैं । इनमें गजब की एकता है । इन्हें जिनसे डर होता है उनके ऊपर आर एस एस से संबंध होने का आरोप लगा देते हैं और उसके शंतिपूर्ण आन्दोलन को कुचल देते हैं ।आर एस एस से संबंध का आरोप लगाने से इनका मकसद ये होता है कि जिससे इनको मुसलमानों का थोक में वोट मिल जाय और ये सत्ता में बने रहें ।वास्तव में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड्ने के लिये ये ही जिम्मेदार हैं ।ठीक ऐसा ही काम स्व. इन्दिरा गाँधी भी किया करती थीं, जब भी उन पर राजनैतिक आँच आई और सत्ता से दूर होने का अंदेशा दिखाई दिया तो उन्होंने फ़ौरन आर एस एस का नाम उछाल दिया । यहाँ तक कि कोई आँधी आ जाये, तूफान या बाढ आ जाये तो उसका कारण भी आर एस एस है, ऐसी व्यंग्योक्ति उस समय प्रचलित हो गई थी । उसी तरह बाबा रामदेव के पूर्ण अहिंसक अनशन कालेधन को वापस लाने, दोषियों को द्ण्ड देने की माँग को लिये था, परन्तु सरकार के एक मंत्री ने पहले तो उनसे बात करके उन्हें ठगा और उन्हें कलंकित करने की कोशिश के साथ अर्धरात्रि में सोये हुए बच्चों, बहनों, बूढों के ऊपर पुलिस का हमला बोल दिया, ऐसा अत्याचार तो अंग्रेज़ों के द्वारा किए गए जलियाँवाला बाग और नादिरशाह द्वारा उसी दिल्ली की गलियों को खून से रँगने की याद ताज़ा करता है ।
कपिल सिब्बल कहते हैं कि बाबा ने तो योग के लिए अनुमति माँगी थी, परन्तु वे राजनीति करने लगे । तो फ़िर सिब्बल साहब, आपने उनसे समझौते की बात क्यों चलाई, और उनके समर्थकों को पहले ही दिल्ली की सीमा पर क्यों नहीं रोका ? और क्या राजनीति पर बात करना कोई गुनाह है ? ये तो अंग्रेज़ी कानून था कि उसने अपने सरकारी कर्मचारियों पर राजनीति में भाग लेने से रोक लगाई थी, नहीं तो उसका शासन नहीं चल पाता । राजनीति पर अपने विचार रखने का तो इस लोकतंत्र में सभी को अधिकार है ।बाबा रामदेव ने तो कालेचोरों पर उँगली उठाई है, और इन कालेचोरों का साहस तो देखिए कि इन्होंने काला धन वापस लाने और उसके दोषियों पर कडी कार्यवाही करने की बात न करके उलटे बाबा्रामदेव की नंगाझोरी ले रहे हैं । इसी को कहते हैं - उलटे चोर कोतवाल को डाँटे, या ढीठ चोर सेंध में गावै ।
कपिल साहब कहते हैं कि या तो योग करो या राजनीति, दोनों एक साथ नहीं, क्योंकि केवल एक की अनुमति लिया है । यह तो वैसे ही हुआ कि कोई बच्चा दीर्घशंका की अनुमति लेकर जाय और लघुशंका भी करने लगे तो टीचर उसे छडी लेकर मारने लगे कि तुम्हें तो केवल दीर्घशंका की अनुमति मिली है लघुशंका क्यों करने लगे ?
केन्द्र सरकार ने ४ जून को दिल्ली में जो किया वह लोकतंत्र के माथे पर कलंक ही नहीं है बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटने का पूर्वाभ्यास है । लेकिन यह बहदुरी नहीं बल्कि सरकार की खीझ है, कि उस पर निरंतर नपुंसकता के आरोप लग रहे हैं, और हाल में अन्ना हजारे के सामने द्ण्डवत करके आई है ।
अरे! अगर इस सरकार में साहस है तो अफ़जल गुरू और कसाब को दण्ड दे, देशद्रोहियों को दण्डित करे देशप्रेमियों को नहीं । इस सरकार के मंत्री भी बदहवास और विक्षिप्त हुए से लगते हैं, कुछ तो पालतू बुलडाग जैसा आचरण कर रहे हैं । इनकी निगाह में अहिंसा का कोई मतलब नहीं है । इनसे सद्व्यवहार की आशा निरा दुःस्वप्न है । जैसे हिंसक पशु के सामने निहत्थे होकर जाया जाय, या कोई पागल कुत्ता हो उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह नहीं काटेगा । वह कब हमला कर दे इसका कोई ठिकाना नहीं । अहिंसा का पालन सज्जनों के साथ होता है दुर्जनों के साथ नहीं । दुर्जनों से ऐसी आशा करना सिवाय सद्गुणविकृति के और कुछ नहीं ।