Friday, 9 December 2011

HIRI PAKARIYA-OUTLOOK

हीडी पकडिया फ़ैज़ाबाद (सम्प्रति अम्बेदकर नगर) जनपद का सबसे बड़े गाँवों में से एक है । इसमें कई पुरवे (छोटे पुर) जैसे एकइयाँ, डेढइयाँ, पकडिया, ऊसरपुर, पटीवाँ आदि हैं । इसके आदि पूर्वज बाबा हिम्मतशाह थे । इसमें क्षत्रिय राजपूतों का बाहुल्य है; जिनकी उप जाति ’राजकुमार’ है, जो चौहान वंश से सम्बन्धित हैं । इनका मूल स्थान बूधापुर (जिला सुल्तानपुर) है

प्रसिद्ध ग्राम प्रधानों में स्व. कमला प्रसाद सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने संसाधनों की कमी के बावजूद अनेक कार्य तत्समय में सम्पन्न कराये जिनमें से मुख्य नाले पर पुल का निर्माण, पंचायत घर, प्राइमरी स्कूल भवन, कन्या प्राइमरी भवन, मुर्गी घर, साँड घर, तथा प्राइवेट मिडिल कक्षा तक विद्यालय आदि थे ।

सांस्कृतिक क्रिया कलापों में भी उनकी गहरी रुचि थी । उन्होंने अपने कुछ मुख्य सहयोगियों सर्व श्री राजमणि सिंह, कमला कान्त सिंह, श्रीपति सिंह आदि के साथ मिलकर एक नौटंकी कला कम्पनी की भी स्थापना की थी जिसके मास्टर मुहम्मद अली थे ।

सम्प्रति गाँव के प्रधान देवी प्रसाद हैं । श्री शेषमणि सिंह महरुआ गोला के प्रधानाचार्य हैं । अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों में भीम सिंह, दल बहादुर सिंह(सिकन्दर), शिव पूजन सिंह, राम पूजन सिंह, कृष्ण पूजन सिंह, इन्द्र सेन सिंह, का नाम प्रमुखता से लिया जाता है । राष्ट्रीय धारा के कवि श्री दिनेश कुमार सिंह ’घायल’ इसी गाँव के हैं ।

भौगोलिक स्थिति : अम्बेदकरनगर जिला मुख्यालय (अकबरपुर) से सुल्तानपुर को जाने वाले राजमार्ग से लगभग १५ किमी. पर यह गाँव स्थित है ।

Thursday, 8 December 2011

Sunday, 30 October 2011

गाँधी तेरे देश में


उससे अच्छा अंग्रेज़ है  

भारत माँ को माता कहने से जिसको परहेज़ है
कितना भी हो घोर दुष्ट उससे अच्छा अंग्रेज़ है  ॥


अकलमन्द कुछ ऐसे वोटों के सौदागर आते हैं
ऐसे लोगों का भारत पर पहला हक बतलाते हैं
अखबारों में छपी हुई यह खबर सनसनीखेज़ है
कितना भी हो घोर दुष्ट उससे अच्छा अंग्रेज़ है  ॥


लूट रहा है देश की दौलत भेज रहा परदेश में
डाकू चोर लुटेरा दिखता नेताजी के वेश में
उसका ही दादा नाना तैमूरलंग चंगेज़ है
कितना भी हो घोर दुष्ट उससे अच्छा अंग्रेज़ है  ॥


राष्टीय मूल्यों से अनबन देशद्रोहियों से नाता
ओसामा लादेन को ओसामाजी कहना है भाता
संतों को भी ठग कहने से उसको नहीं गुरेज़ है
कितना भी हो घोर दुष्ट उससे अच्छा अंग्रेज़ है  ॥


ऐसे ही कृतघ्न लोगों के कारण देश गुलाम हुआ
देशवासियों का विधर्मियों द्वारा कत्लेआम हुआ
देखो देखो रामदीन बन बैठा अल्लाभेज है
कितना भी हो घोर दुष्ट उससे अच्छा अंग्रेज़ है  ॥

Sunday, 4 September 2011

शस्त्रेण रक्षते राष्ट्रे शास्त्र चिंता प्रवर्तते

वीर विनायक दामोदर सावरकर

संक्षिप्त परिचय
वीरभूमि महाराष्ट्र के नासिक जिले में छोटा सा ग्राम - भगूर ।
पिता : श्री दामोदर सावरकर ( चितपावन वंशीय ब्राह्मण )
माता : श्रीमती राधाबाई
जन्म : २८ मई १८८३  निर्वाण : २६ फरवरी १९६६
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स्वाधीनता संग्राम में योगदान

     बचपन से लेकर मृत्यु पर्यन्त उनके जीवन का एक एक क्षण राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रसेवा, साहित्यसेवा एवं  हिन्दुराष्ट्र  के पुरुत्थान के लिए संघर्ष में व्यतीत हुआ । देश की स्वाधीनता के लिए जीवन के अन्तिम क्षणों तक जूझते रहने की दृढ प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए "मित्रमेला" नामक संस्था बनाकर "गणेशोत्सव", "शिवाजीमहोत्सव" आदि कार्यक्रम के माध्यम से युवकों में सशस्त्र क्रान्ति का प्रचार किया । कालान्तर में इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक अन्य संस्था "अभिनव भारत" की स्थापना की । "१८५७ का स्वातन्त्र्य समर" नामक ग्रन्थ लिखा जिसकी प्रेरणा से सुभाषचन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की स्थापना की ।


     इंग्लैण्ड से भारत बन्दी बनाकर लाए जाते समय  जहाज के पोर्ट होल से समुद्र में कूदकर गोलियों की बौछार से बचते हुए समुद्र-तरण कर फ्रान्स की सीमा में प्रवेश । क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण दो आजन्म कारावास का दण्ड ।


     इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध पत्रकार गाय अल्फ्रेड की टिप्पणी - "मेरी यह धारणा है कि वीरसावरकर की पीढी में उनके समान कोई प्रभावी, साहसी, दृढदेशभक्त भारत वर्ष में पैदा ही नहीं हुआ है ।वीर सावरकर केवल हिन्दी देशभक्त ही नहीं अपितु समस्त विश्व के प्रेरणा श्रोत देशभक्त हैं । मैं तो मानव समाज के दर्शनकार के रूप में उन्हें देखता हूँ । भारतीय जनता का यह आद्यकर्तव्य है कि सम्पूर्ण स्वतंत्रता के जनक के रूप में उनका सत्कार करे ।


     अण्डमन कारागार में वीरसावरकर ने "कमला", "गोमान्तक", एवं "विरहोच्छास" काव्यों की रचना की । तत्पश्चात "हिन्दुत्व", "हिन्दूपदपादशाही", "उःशाप", "उत्तरक्रिया", सन्यस्त खड्ग", "भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ" आदि प्रमुख ग्रन्थ लिखे ।


     उन्होंने "विशुद्ध हिन्दी अपनाओ" आन्दोलन प्रारम्भ किया । "शहीद" का "हुतात्मा", "प्रूफ" का "उपमुद्रित", "मोनोपोली" का "एकत्व", "मेयर" का "महापौर" आदि सैकडों हिन्दी विकल्प सावरकर की ही देन है । सावरकर जी के विरोध के कारण, गाँधीजी की हिन्दी-उर्दू मिश्रित भगवान राम को "शहज़ादा राम", महाराजा  दशरथ को "बादशाह दशरथ", माता सीता को "बेगम सीता" एवं महर्षि वाल्मीकि को "मौलाना वाल्मीकि" शब्दों से सम्बोधित करानेवाली "हिन्दुस्तानी भाषा" का प्रस्ताव पूना के राष्ट्रभाषा सम्मेलन मे गिरा दिया गया ।


वीरसावरकर द्वारा दिए गए कुछ विशिष्ट उद्घोष -
१. सम्पूर्ण अहिंसा की नीति आत्मघाती नीति है, एक बडा भारी पाप है ।
२. राजनीति का हिन्दूकरण - हिन्दुओं का सैनिकीकरण ।
३. ऐ सिन्धु ! मुक्त करेगी तुझे महाराष्ट्र की रक्तविन्दु ।
४. सत्याग्रह नहीं शस्त्राग्रह ।
५. "बुद्ध" अथवा "युद्ध" ।
६. "धर्मान्तरण" याने "राष्ट्रान्तरण" ।
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 हिन्दू की परिभाषा -


"आसिन्धु सिन्धु पर्यन्त यस्य भारत भूमिका
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दूरिति स्मृतः      ॥
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कवियों एवं साहित्यकारों के सिरमौर महाकवि महर्षि व्यास ने भी शस्त्र की महत्ता पर अपने विचार दिए हैं -


अमर्याद प्रवृत्ते च शत्रुभिस्संगरे कृते
सर्वे वर्णाश्च दृश्येयुः शस्त्रवन्तो युधिष्ठिर ॥

Monday, 6 June 2011

काला चोर ले गया

मुन्नी तेरी मोरनी को मोर ले गया, बाकी जो बचा था काला चोर ले गया

यह फ़िल्मी गीत सुनकर लगता है कि कितने वर्षों बाद इसका अर्थ सामने आया । कवि का आशय है क्या था परंतु आज के परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखें तो लगता है  कि हमारे देश को शकों, हूणों, खिलज़ियों, मुग़लों, चंगेज़खानों, तैमूरलंगों, ग़ज़नबियों तथा नादिरशाहों ने तो पूर्व में लूटा ही, और जो बाकी बचा था, वह इन कालेचोरों अर्थात कालाधन चुराकर विदेश भेजनेवालों ने लूट लिया । इन काले चोरों ने देश की जनता का धन लूटकर उन्हें गरीब बना दिया है, और खुद मालामाल हो गए हैं । वोट लेने के समय उसमें से कुछ गरीबों में बाँटकर फिर उनसे वोटॊं का सौदा कर लेते हैं, और कुर्सी पाकर लूट करने लगते हैं । इस लूट का काला धन विदेश भेज देते हैं । इन्हें कालाचोर कहें, वोटॊं के सौदागर कहें, तैमूरलंग, चंगेज़खाँ के उत्तराधिकारी कहें या कुछ और । इन्हें किसी दायरे में नहीं बाँधा जा सकता । ये बडे कुटिल हैं, और जो इन पर उँगली उठाता है, उसके हाथ काटने के लिये ये तत्पर हो जाते हैं । इनमें गजब की एकता है । इन्हें जिनसे डर होता है उनके ऊपर आर एस एस से संबंध होने का आरोप लगा देते हैं और उसके शंतिपूर्ण आन्दोलन को कुचल देते हैं ।आर एस एस से संबंध का आरोप लगाने से इनका मकसद ये होता है कि जिससे इनको मुसलमानों का थोक में वोट मिल जाय और ये सत्ता में बने रहें ।वास्तव में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड्ने के लिये ये ही जिम्मेदार हैं ।ठीक ऐसा ही काम स्व. इन्दिरा गाँधी भी किया करती थीं, जब भी उन पर राजनैतिक आँच आई और सत्ता से दूर होने का अंदेशा दिखाई दिया तो उन्होंने फ़ौरन आर एस एस का नाम उछाल दिया । यहाँ तक कि कोई आँधी आ जाये, तूफान या बाढ आ जाये तो उसका कारण भी आर एस एस है, ऐसी व्यंग्योक्ति उस समय प्रचलित हो गई थी । उसी तरह बाबा रामदेव के पूर्ण अहिंसक अनशन कालेधन को वापस लाने, दोषियों को द्ण्ड देने की माँग को लिये था, परन्तु सरकार के एक मंत्री ने पहले तो उनसे बात करके उन्हें ठगा और उन्हें कलंकित करने की कोशिश के साथ अर्धरात्रि में सोये हुए बच्चों, बहनों, बूढों के ऊपर पुलिस का हमला बोल दिया, ऐसा अत्याचार तो अंग्रेज़ों के द्वारा किए गए जलियाँवाला बाग और नादिरशाह द्वारा उसी दिल्ली की गलियों को खून से रँगने की याद ताज़ा करता है ।


कपिल सिब्बल कहते हैं कि बाबा ने तो योग के लिए अनुमति माँगी थी, परन्तु वे राजनीति करने लगे । तो फ़िर सिब्बल साहब, आपने उनसे समझौते की बात क्यों चलाई, और उनके समर्थकों को पहले ही दिल्ली की सीमा पर क्यों नहीं रोका ? और क्या राजनीति पर बात करना कोई गुनाह है ? ये तो अंग्रेज़ी कानून था कि उसने अपने सरकारी कर्मचारियों पर राजनीति में भाग लेने से रोक लगाई थी, नहीं तो उसका शासन नहीं चल पाता । राजनीति पर अपने विचार रखने का तो इस लोकतंत्र में सभी को अधिकार है ।बाबा रामदेव ने तो कालेचोरों पर उँगली उठाई है, और इन कालेचोरों का साहस तो देखिए कि इन्होंने काला धन वापस लाने और उसके दोषियों पर कडी कार्यवाही करने की बात न करके उलटे बाबा्रामदेव की नंगाझोरी ले रहे हैं । इसी को कहते हैं - उलटे चोर कोतवाल को डाँटे, या ढीठ चोर सेंध में गावै ।


कपिल साहब कहते हैं कि या तो योग करो या राजनीति, दोनों एक साथ नहीं, क्योंकि केवल एक की अनुमति लिया है । यह तो वैसे ही हुआ कि कोई बच्चा दीर्घशंका की अनुमति लेकर जाय और लघुशंका भी करने लगे तो  टीचर उसे छडी लेकर मारने लगे कि तुम्हें तो केवल दीर्घशंका की अनुमति मिली है लघुशंका क्यों करने लगे ?


केन्द्र सरकार ने ४ जून को दिल्ली में  जो किया वह लोकतंत्र के माथे पर कलंक ही नहीं है बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटने का पूर्वाभ्यास है । लेकिन यह बहदुरी नहीं बल्कि सरकार की खीझ है, कि उस पर निरंतर नपुंसकता के आरोप लग रहे हैं, और हाल में अन्ना हजारे के सामने द्ण्डवत करके आई है ।


अरे! अगर इस सरकार में साहस है तो अफ़जल गुरू और कसाब को दण्ड दे, देशद्रोहियों को दण्डित करे देशप्रेमियों को नहीं । इस सरकार के मंत्री भी बदहवास और विक्षिप्त हुए से लगते हैं, कुछ तो पालतू बुलडाग जैसा आचरण कर रहे हैं । इनकी निगाह में अहिंसा का कोई मतलब नहीं है । इनसे सद्व्यवहार की आशा निरा दुःस्वप्न है । जैसे हिंसक पशु के सामने निहत्थे होकर जाया जाय, या कोई पागल कुत्ता हो उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह नहीं काटेगा । वह कब हमला कर दे इसका कोई ठिकाना नहीं । अहिंसा का पालन सज्जनों के साथ होता है दुर्जनों के साथ नहीं । दुर्जनों से ऐसी आशा करना सिवाय सद्गुणविकृति के और कुछ नहीं ।



Wednesday, 1 June 2011

राष्ट्रीय नौटंकी

दृश्य एक (महाकाल्पनिक)

स्वन्तंत्रता प्राप्ति के अवसर पर गाँधीजी समेत की राष्ट्रीय हस्तियाँ खुशी का जश्न मना रहीं थीं । इस मौके पर मनोरंजन के लिए एक तवायफ़ को बुलाया गया जिसने नाचना आअरम्भ किया । उसने इतना तेज नृत्य किया कि हवा से उसका लहँगा ऊपर उठ गया । उपस्थित सभी लोगों ने अपनी आँखें मूँद लीं । फ़िर थोडी देर बाद धीरे धीरे सभी ने अपनी आँखें खोलीं । जवाहर्लाल जी ने पूछा बापू आप ने आँखें क्यों मूँद लीं, तो गाँधीजी ने कहा कि उस समय मुझे साबरमती आशम दिखायी पडा जहाँ मैं कन्याओं के साथ अपने कामजयी होने का परीक्षण किया करता था, उसी में मैं ध्यानमग्न हो गया था । अच्छा तुम सभी बताओ कि तुमने क्यों आँखें मूँद ली । एक एक करके सभी ने अपने अनुभव बताए । जवाहरलाल जी ने कहा कि उस समय जब उसका लहँगा ऊपर उठ गया था तो मुझे तिरंगा झण्डा नज़र आया िसलिए उसे नमन कर रहा था ।
     कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर से पूछा गया तो उन्होने कहा कि मुझे तो बंगाल की खाडी नज़र आई इसलिए मैं वंगभूमि (भंगभूमि) को प्रणाम कर रहा था ।
     आर एस एस प्रमुख ने बताया कि मुझे तो हल्दीघाटी का दृश्य दिखयी दिया ।
     सीमांत गाँधी अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ से पूछागया तो उन्होंने कहा कि मुझे तो पाक हज़रत बल का दीदार हुआ ।

दृश्य - दो (अतिकाल्पनिक)

कालान्तर में स्वतंत्रता दिवस  के एक अन्य आयोजन में उसी प्रकार का नत्य हुआ और जब नर्तकी ने जोर से नाच दिखयी तो उसका लहँगा ऊपर उठ गया । इस पर उस महफ़िल में उपस्थित भूत्पूर्व प्रधन्मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से जब पूछा गया कि उन्होंने क्यों आँख मूँद ली तो उन्होंने कहा कि मुझे तो साक्षात क्न्या कुमारी के दर्शन हुए इसलिये मैं भ्हवविभोर हो गया । जब मुलायम सिंग यादव से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि मुझे तो बाबरी मस्जिद का टूटा ढँचा नज़र आया जिसमें परिंदा पर मार चुका था, इस्लिए उसी शोक में मैंने आँखें मूँद ली थी ।

दृश्य तीन (काल्पनिक)

एक अन्य स्वतंत्रता दिवस की संध्या पर पुनः उसी तरह का आयोजन हुआ और नर्तकी ने अपना नृत्य आरंभ किया । मह्फ़िल में प्रधानमंत्री डाँ. मनमोहन सिंह अपने मंत्रिमण्डलीय सहयोगियों के साथ नृत्य का आनंद ले रहे थे । विपक्ष द्वारा उन पर बार बार ढीला होने का आरोप लग रहा था । अतः वे जोश में आए और्भाँगडा डांस करने लगे, परन्तु अभ्यास न होने के कारण अच्छी तरह से डांस नहीं कर पा रहे थे, तो नर्तकी ने कहा कि प्रधनमंत्रीजी ये कोई डांस है, ये आप क्या कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा बाईजी मैं डांस थोडे न कर रहा हूँ, मैं तो कश्मीर समस्या हल कर रहा हूँ ।

Tuesday, 31 May 2011

तेरे भारत को क्या हुआ बापू

तेरे भारत को क्या हुआ बापू
उठ रहा हर तरफ़ धुआँ बापू
ओढ कर स्यार आ गये खद्दर
कर रहे हैं हुआँ हुआँ बापू       ॥

Wednesday, 18 May 2011

बीसन झापड पऊत्या बप्पू

कवि इन्दु प्रकाश ’इन्दु’ की एक रचना मे अहिंसा तथा देश के हालात पर चिंता कुछ इस प्रकार है -

देशवा माँ जौ फिर अऊत्या बप्पू
नीक बाति समझऊत्या बप्पू
सत्य अहिंसा कहत भरेमा
बीसन लप्पड पऊत्या बप्पू ॥

अहिंसा का अतिवाद

अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में गान्धीजी अतिवादी थे ।गान्धीजी सद्गुणविकृति के रोगी थे ।अहिंसा के प्रति अतिवादी एवं दुराग्रही थे । मनुष्य में दो प्रकार की विकृतियाँ होती हैं । एक सद्गुणविकृति और दूसरी दुर्गुणसुकृति ।जैसे कोई डाकू किसी आततायी का धन अपहरण करे और उसे गरीबों में बाँट दे, यह दुर्गुणसुकृति का उदाहरण है । परंतु यदि कोई मानवीय गुणों का अतिक्रमण करे जिसका परिणाम देश समाज के लिये घातक हो, तो वह सद्गुणविकृति की श्रेणी में आता है ।अहिंसा एक और उदाहरण पूर्व में मिलता है जब एक जैन धर्मी राजा ने अपने देश में यह राजाग्या जारी की थी कि कोई भी व्यक्ति यदि हिंसा करेगा तो उसे फाँसी की सज़ा दी जायेगी और उसी राज्य के किसी नागरिक ने एक खटमल को मार दिया तो उसे फाँसी दे दी गयी । इसे अहिंसा का अतिवाद या अहिंसा का नंगा नाच नहीं तो और क्या कहा जायेगा ।
दे दी हमें आज़ादी हमें खड्ग बिना ढाल... का नारा भी बेहद भ्रामक और बेहूदा है यह तो छोटे बच्चों को बहलाने जैसा हुआ परन्तु आज का भारतिय समाज अब इन झाँसों में आने वाला नहीं है ।
गांधी तेरी विकृत अहिंसा का जवाब लिख जाऊँगा, बूढे भारत के माथे पर मैं शबाब लिख जाऊँगा
इसी सदी में इसी कलम से मैं ये वादा करता हूँ, बच्चे बच्चे की ज़बान पर इन्कलाब लिख जाऊँगा ।

Saturday, 14 May 2011

अहिंसा का नंगा सच

अहिंसा वैसे तो भारतीय चिंतन की धारा में समयी हुई है परन्तु गाँधीजी ने अहिंसा का अतिवादी स्वरूप प्रस्तुत किया । गाँधीजी की अहिंसा व्यावहारिक नहीं है । गाँधी चिंतन यथार्थ से परे है एक दिवा स्वप्न की तरह । इसीलिए गाँधी अनेक बार असफल सिद्ध हुए हैं । सारी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढाने वाले तथा निरस्त्रीकरण की सलाह देने वाले गाँधी की बात को न तो दुनिया ने मानी और न ही उनके चेलों ने ।राजनीतिक पटल पर गाँधीजी पूर्णतया असफल सिद्ध हुए । गाँधीजी न तो उत्क्रिष्ट विचारक थे न राजनेता और न ही राजपुरुष ।गाँधीजी का चिंतन देश के लिए आत्मघाती था ।गाँधीजी की नीतियों पर चलकर देश को आज़ादी न तो मिल सकती थी और न ही मिली । वो तो हमारे देश के वीर क्रान्तिकारी सपूतों के त्याग और बलिदान का प्रतिफल था कि हम आज अज़ाद हैं । गाँधीजी ने तो क्रान्तिकारियों राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस को उपेक्षित किया और उनकी भर्त्सना की । ऐसे गाँधीवाद से तौबा तौबा ।

Wednesday, 11 May 2011

काफ़िर कौन


  • काफ़िर कौन - वह जो कुफ़्र करे अर्थात खुदा के बताये ्या इसलाम  के बताये रास्ते पर न चले । ऐसे व्यक्ति की ज़र जोरू ज़मीन तीनों हलाल है - अहले इसलाम
  • मुनकिर- जो दूसरा धर्म छोड्कर  इस्लाम  स्वीकार करे और फिर उसे छोडकर पुनः मूल धर्म  स्वीकार कर ले । उसके लिए द्ण्ड है कि उसे देखती ही उसका सिर उसके धड से अलग कर दिया जाय - अहले इस्लाम 
  • इस्लाम पूरी दुनिया को दो भागों में देखता है पहला दारुलैसलाम और दूसरा दारुल हर्ब । इस्लाम सारी दुनिया को दारुल इसलाम बनाना चाहता है ।

Monday, 9 May 2011

कल्पना गाँधी की

मेरी है यह विकट कल्पना नभ के तारे तोडूँगा
दुनिया नहीं गोड पाया पर सारा भारत गोडूँगा
मुझसे बडा हठी दुनिया में कोई नहीं हुआ होगा
चाहे जितना कालिख पोतो फिर भी मुँह ना मोडूँगा
जिसको करने में कविवर रहीम का माथा चकराया
साथ लगाकर बेर केर आपस में नाता जोडूँगा
नाम कमाना है कुछ करना है तो उल्टी चाल चलो
लोगों से कह दो कि मैं बालू से तेल निचोडूँगा
दुश्मन से लडने का करतब मेरी अहिंसा बतलाती
कह दो परेशान मत हो मैं खुद अपना सिर फोडूँगा ॥

गाँधी तेरे देश में ये कैसा भ्रष्टाचार ।


गाँधी तेरे देश में ये कैसा भ्रष्टाचार ।
गान्धी तेरे तीनों बन्दर खादी पहने बने सिकंदर
जनता का धन लूट लूट कर पैदा करते रोज़ बवन्डर
देश में जो होता होने दे आँख मूंद ले यार
गाँधी तेरे...