अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में गान्धीजी अतिवादी थे ।गान्धीजी सद्गुणविकृति के रोगी थे ।अहिंसा के प्रति अतिवादी एवं दुराग्रही थे । मनुष्य में दो प्रकार की विकृतियाँ होती हैं । एक सद्गुणविकृति और दूसरी दुर्गुणसुकृति ।जैसे कोई डाकू किसी आततायी का धन अपहरण करे और उसे गरीबों में बाँट दे, यह दुर्गुणसुकृति का उदाहरण है । परंतु यदि कोई मानवीय गुणों का अतिक्रमण करे जिसका परिणाम देश समाज के लिये घातक हो, तो वह सद्गुणविकृति की श्रेणी में आता है ।अहिंसा एक और उदाहरण पूर्व में मिलता है जब एक जैन धर्मी राजा ने अपने देश में यह राजाग्या जारी की थी कि कोई भी व्यक्ति यदि हिंसा करेगा तो उसे फाँसी की सज़ा दी जायेगी और उसी राज्य के किसी नागरिक ने एक खटमल को मार दिया तो उसे फाँसी दे दी गयी । इसे अहिंसा का अतिवाद या अहिंसा का नंगा नाच नहीं तो और क्या कहा जायेगा ।
दे दी हमें आज़ादी हमें खड्ग बिना ढाल... का नारा भी बेहद भ्रामक और बेहूदा है यह तो छोटे बच्चों को बहलाने जैसा हुआ परन्तु आज का भारतिय समाज अब इन झाँसों में आने वाला नहीं है ।
गांधी तेरी विकृत अहिंसा का जवाब लिख जाऊँगा, बूढे भारत के माथे पर मैं शबाब लिख जाऊँगा
इसी सदी में इसी कलम से मैं ये वादा करता हूँ, बच्चे बच्चे की ज़बान पर इन्कलाब लिख जाऊँगा ।