Tuesday, 31 May 2011

तेरे भारत को क्या हुआ बापू

तेरे भारत को क्या हुआ बापू
उठ रहा हर तरफ़ धुआँ बापू
ओढ कर स्यार आ गये खद्दर
कर रहे हैं हुआँ हुआँ बापू       ॥

Wednesday, 18 May 2011

बीसन झापड पऊत्या बप्पू

कवि इन्दु प्रकाश ’इन्दु’ की एक रचना मे अहिंसा तथा देश के हालात पर चिंता कुछ इस प्रकार है -

देशवा माँ जौ फिर अऊत्या बप्पू
नीक बाति समझऊत्या बप्पू
सत्य अहिंसा कहत भरेमा
बीसन लप्पड पऊत्या बप्पू ॥

अहिंसा का अतिवाद

अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में गान्धीजी अतिवादी थे ।गान्धीजी सद्गुणविकृति के रोगी थे ।अहिंसा के प्रति अतिवादी एवं दुराग्रही थे । मनुष्य में दो प्रकार की विकृतियाँ होती हैं । एक सद्गुणविकृति और दूसरी दुर्गुणसुकृति ।जैसे कोई डाकू किसी आततायी का धन अपहरण करे और उसे गरीबों में बाँट दे, यह दुर्गुणसुकृति का उदाहरण है । परंतु यदि कोई मानवीय गुणों का अतिक्रमण करे जिसका परिणाम देश समाज के लिये घातक हो, तो वह सद्गुणविकृति की श्रेणी में आता है ।अहिंसा एक और उदाहरण पूर्व में मिलता है जब एक जैन धर्मी राजा ने अपने देश में यह राजाग्या जारी की थी कि कोई भी व्यक्ति यदि हिंसा करेगा तो उसे फाँसी की सज़ा दी जायेगी और उसी राज्य के किसी नागरिक ने एक खटमल को मार दिया तो उसे फाँसी दे दी गयी । इसे अहिंसा का अतिवाद या अहिंसा का नंगा नाच नहीं तो और क्या कहा जायेगा ।
दे दी हमें आज़ादी हमें खड्ग बिना ढाल... का नारा भी बेहद भ्रामक और बेहूदा है यह तो छोटे बच्चों को बहलाने जैसा हुआ परन्तु आज का भारतिय समाज अब इन झाँसों में आने वाला नहीं है ।
गांधी तेरी विकृत अहिंसा का जवाब लिख जाऊँगा, बूढे भारत के माथे पर मैं शबाब लिख जाऊँगा
इसी सदी में इसी कलम से मैं ये वादा करता हूँ, बच्चे बच्चे की ज़बान पर इन्कलाब लिख जाऊँगा ।

Saturday, 14 May 2011

अहिंसा का नंगा सच

अहिंसा वैसे तो भारतीय चिंतन की धारा में समयी हुई है परन्तु गाँधीजी ने अहिंसा का अतिवादी स्वरूप प्रस्तुत किया । गाँधीजी की अहिंसा व्यावहारिक नहीं है । गाँधी चिंतन यथार्थ से परे है एक दिवा स्वप्न की तरह । इसीलिए गाँधी अनेक बार असफल सिद्ध हुए हैं । सारी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढाने वाले तथा निरस्त्रीकरण की सलाह देने वाले गाँधी की बात को न तो दुनिया ने मानी और न ही उनके चेलों ने ।राजनीतिक पटल पर गाँधीजी पूर्णतया असफल सिद्ध हुए । गाँधीजी न तो उत्क्रिष्ट विचारक थे न राजनेता और न ही राजपुरुष ।गाँधीजी का चिंतन देश के लिए आत्मघाती था ।गाँधीजी की नीतियों पर चलकर देश को आज़ादी न तो मिल सकती थी और न ही मिली । वो तो हमारे देश के वीर क्रान्तिकारी सपूतों के त्याग और बलिदान का प्रतिफल था कि हम आज अज़ाद हैं । गाँधीजी ने तो क्रान्तिकारियों राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस को उपेक्षित किया और उनकी भर्त्सना की । ऐसे गाँधीवाद से तौबा तौबा ।

Wednesday, 11 May 2011

काफ़िर कौन


  • काफ़िर कौन - वह जो कुफ़्र करे अर्थात खुदा के बताये ्या इसलाम  के बताये रास्ते पर न चले । ऐसे व्यक्ति की ज़र जोरू ज़मीन तीनों हलाल है - अहले इसलाम
  • मुनकिर- जो दूसरा धर्म छोड्कर  इस्लाम  स्वीकार करे और फिर उसे छोडकर पुनः मूल धर्म  स्वीकार कर ले । उसके लिए द्ण्ड है कि उसे देखती ही उसका सिर उसके धड से अलग कर दिया जाय - अहले इस्लाम 
  • इस्लाम पूरी दुनिया को दो भागों में देखता है पहला दारुलैसलाम और दूसरा दारुल हर्ब । इस्लाम सारी दुनिया को दारुल इसलाम बनाना चाहता है ।

Monday, 9 May 2011

कल्पना गाँधी की

मेरी है यह विकट कल्पना नभ के तारे तोडूँगा
दुनिया नहीं गोड पाया पर सारा भारत गोडूँगा
मुझसे बडा हठी दुनिया में कोई नहीं हुआ होगा
चाहे जितना कालिख पोतो फिर भी मुँह ना मोडूँगा
जिसको करने में कविवर रहीम का माथा चकराया
साथ लगाकर बेर केर आपस में नाता जोडूँगा
नाम कमाना है कुछ करना है तो उल्टी चाल चलो
लोगों से कह दो कि मैं बालू से तेल निचोडूँगा
दुश्मन से लडने का करतब मेरी अहिंसा बतलाती
कह दो परेशान मत हो मैं खुद अपना सिर फोडूँगा ॥

गाँधी तेरे देश में ये कैसा भ्रष्टाचार ।


गाँधी तेरे देश में ये कैसा भ्रष्टाचार ।
गान्धी तेरे तीनों बन्दर खादी पहने बने सिकंदर
जनता का धन लूट लूट कर पैदा करते रोज़ बवन्डर
देश में जो होता होने दे आँख मूंद ले यार
गाँधी तेरे...