Sunday, 18 November 2012

रामलीला हींड़ी पकरिया २०१२-वीडियो

निर्देशक : शेषमणि सिंह ’शेष’

नायक : राजेन्द्र सिंह
अन्य कलाकार: देवी प्रसाद सिंह, सत्य प्रकाश सिंह, 
सहयोग : माधव सिंह, भम्भू सिंह, दल बहादुर सिंह उर्फ़ सिकन्दर सिंह, एवं अन्य
आईटी प्रमुख:दिनेश कुमार सिंह ’घायल’


Friday, 26 October 2012

बकरीद बनाम निर्दोषों की हत्या

आज बकरीद है । सभी अपने मुसलमान मित्रों को बधाइयाँ दे रहे होंगे । मैं भी एक ऐसे ही मित्र को बधाई देने को सोच रहा था लेकिन फिर मन में विचार आया कि बधाई संदेश में क्या लिखूँ , बकरा खाने की बधाई अथवा तथाकथित त्याग और बलिदान की बधाई ऐसे सामूहिक प्राणिहत्या पर्व पर दुख इस बात का है कि सारे विश्व के तथाकथित अहिंसावादी मौन हैं ।

मैं अब अपने किसी मुसलमान मित्र को बधाई तब दूँगा जब वह ऐसी नृशंस सामूहिक हत्याओं का परित्याग ही नहीं विरोध भी करेगा तथा अपनी तृष्णाओं का बलिदान करेगा ।

त्याग और बलिदान के इस पर्व को उसके उसी रूप में मनाया जाये इसके लिए सभी को बधाई । 

एक मुक्तक प्रस्तुत है:

मोक्ष की कामना देखिए 
स्वार्थ की साधना देखिए ।|
माँगते हैं मेरी अस्थियाँ
 उनकी ये याचना देखिए ।|
ईश का मोल है कर रहा
भक्त की भावना देखिए ।|
काट निबलों का सिर बलि कहें
 उनकी आराधना देखिए ॥
शीश से खंग काटेगा ये
 मूढ़ की कल्पना देखिए ||
देव दैत्यों में अब हो रहा 
आमना सामना देखिए ||
आज 'घायल' हुए लोग क्यों
 उनकी सद्भावना देखिए ॥


Wednesday, 15 August 2012

कोमल शास्त्री के कुछ मुक्तक

कोमल शास्त्री के कुछ मुक्तक

जाने ख़ुदा ताउम्र ये मंज़र नहीं दे्खा
मीठा शहद का तुझसा समण्दर नहीं देखा
देखे हैं असलहों के ज़खीरे भी कई बार
लेकिन तेरी निगाह सा खंज़र नहीं देखा ॥

कश्तियाँ डगमगाने लगी हैं
मछलियाँ मुंह चिढ़ाने लगी हैं
अब तो रिश्तों की परछाइयों से
लड़्कियाँ खौफ़ खाने लगी हैं ॥

दर्द जिसने नहीं सहा होगा
गीत उसने नहीं कहा होगा
कोई काँटा ज़रूर दिल में है
अश्क़ ऐसे नहीं बहा होगा ॥

बाहर की सुन चुका हूँ अन्दर की बात कर
भूखों के इस शहर में लंगर की बात कर
होगा बड़ा वो कोमल तो होगा अपने घर का
प्यासा हूँ तू न मुझसे समन्दर की बात कर ॥

अब तो अपनों की मुलाक़ात से डर लगता है
कहीं जाओ तो खुराफ़ात से डर लगता है
कितना किरदार पे हाबी है सियासत कोमल
किसी की दी हुई सौगात से डर लगता है ॥

अच्छी बुरी हर शय यहाँ है लूट जाने के लिए 
ये बहारें आज हैं कल छूट जाने के लिए
जिसपे तुझको नाज़ है कोमल जवानी का बहुत
ये खिलौना भी बना है टूट जाने के लिए

पत्थरों को भी पटा कर दिल लगाना सीखिए
आप अपने आप से ही मुस्कराना सीखिए
ज़िन्दगी को ठीक ढर्रे पर चलाने के लिए
आँसुओं में ही नहीं रस में नहाना सीखिए ॥

हम शोख परिन्दों को उड़ाया नहीं करते
तिनकों के नशेमन भी जलाया नहीं करते
पानी सा बहाते हैं पसीने को मगर हम
किरदार को पानी में बहाया नहीं करते ॥

करते हैं जो इमकान से ज़्यादा नहीं करते
हम दिल को तोड़ने का इरादा नहीं करते
कल किस चमन में कोमल लग जाय हाज़िरी
कलियों से कभी भौंरे वादा नहीं करते ॥

सागर की तरंगों में रवा ढूँढ रहे हैं
आतिश के मकानों में हवा ढूँढ रहे हैं
हद हो गयी इंसान के फ़ित्रत की यहाँ पर
अब लोग ज़हर खा के दवा ढूँढ रहे हैं ॥

कहीं पत्थर कहीं दरिया ज़मीं नहीं मिलती
बात हर सिम्त से अक्सर बनी नहीं मिलती
दिया अंधे की हथेली पे अगर रखे भी
किसी तरह से उसे रोशनी नहीं मिलती ॥

चमन में आग फैली है बुझाने की ज़रूरत है
गुलिस्ताँ राख होता है बचाने की ज़रूरत है
मछलियाँ मर रहीं हैं मर रहीं मुस्कान फूलों की
इन्हें तालाब का पानी बदलने की ज़रूरत है ॥

न ज़ुबाँ ही हिली न इशारे हुए
बाँसुरी के सभी स्वर किनारे हुए
काट कर है पलटने की आदत जिन्हें
न हमारे हुए न तुम्हारे हुए ॥

ज़िन्दगी जीने की खातिर ज़हर रखिए
हौसला पीने का आठों पहर रखिए
कुछ सँवरने की तमन्ना है अगर
आप मंज़िल पर हमेशा नज़र रखिए ॥

कुछ इधर हो गया कुछ उधर हो गया
ये महल बँट के छोटा सा घर हो गया
जिसमें बचपन की यादें तुम्हारी बचीं
वो शहर आजकल खण्डहर हो गया ॥

सफ़र में साथ चलते हैं कदम खींचा नहीं करते
औ अपने साथियों के साथ भी धोखा नहीं करते
हमारा मशविरा शायद तुम्हें कोमल लगे अच्छा 
परिन्दे घर परिन्दों के कभी फूँका नहीं करते ॥

सुख सुविधाओं के झूले में जीवन नहीं सँवरता है
बिना आग का किए सामना सोना नहीं निखरता है
महिमा मण्डित कोमल कोई रातों-रात नहीं होता
पत्थर को मूरत बनने में एक ज़माना लगता है ॥

अच्छे हैं बहुत दूर से आकाश के तारे
जीना है मगर मुश्किल सपनों के सहारे
सागर का सफ़र कोमल कितना ही सुहाना हो
लेकिन वहाँ से लौट के आना है किनारे ॥

एक बीमारी बहुत है पीर पाने के लिए
एक लाचारी बहुत है दिल हिलाने लिए
ढेर बारूदों के कोमल सर बचा सकते नहीं
एक चिनगारी बहुत है घर जलाने के लिए ॥

पत्थर को परिन्दों से उठाया नहीं करते
जलते हुए चराग बुझाया नहीं करते
हैं बुत परस्त लेकिन मबलब की परस्ती में
हम झूठ के कसीदे गाया नहीं करते ॥

गिन गिन विपदायें लिखता हूँ
जग की ज्वालायें लिखता हूँ
राजनीति का भाँड़ नहीं हूँ
कवि  हूँ कविताएं लिखता हूँ ॥

जलती आग बुझा देता है
धरती स्वर्ग बना देता है
राजनीति जब गिरने लगती
तब साहित्य उठा देता है ॥

हम शायरी व्यापार के निस्बत नहीं करते
करते हैं जो भी उसमें कसरत नहीं करते
कोमल जहाँ कला के कद्रदाँ नहीं होते
हम ऐसी महफिलों में शिरकत नहीं करते ॥

शब्दों के साथ कोई शरारत नहीं करते.
अपने लिए ही इनकी ज़ियारत नहीं करते
हम नित्य नए रंग बनाते हैं कलम से
लेकिन कभी रंगों की तिजारत नहीं करते ॥

Sunday, 6 May 2012

RAMLILA HIRI PAKARIYA VIDEO-2012

Director- Shesh Mani Singh "Shesh"
Hero- Rajendra Singh
Asst Hero- Ram Prag Singh
IT Expert- Dinesh Kumar Singh "Ghayal"

Friday, 20 April 2012

ओसामा ओबामा पढ़ना

ओसामा ओबामा पढ़ना

छ्न्द ताल सुर हैं बेमतलब फिर क्यों सा रे गा मा पढ़ना
चीनी फीकी हो जाएगी नहीं दलाईलामा पढ़ना ॥
परी कथायें हुईं पुरानी हैरीपोटर का युग आया
दादी दादा से अच्छा है बेटा कौआ मामा पढ़ना ॥
याद उसी को सब करते हैं जिसके हाथों में है पैसा
याद रखो श्रीकृष्ण हमेशा चाहे रोज़ सुदामा पढ़ना ॥
गाँधी बाबा अमर हो गए हरिश्चन्द्र का ड्रामा करके
गाँधी बनना है तो बेटा हरिश्चन्द्र का ड्रामा पढ़ना ॥
अटल बिहारी अटल हो गए प्रगतिशीलता का है मौसम
साँझ सवेरे हँसते गाते ओसामा ओबामा पढ़ना ॥

Sunday, 15 April 2012

POETS OF AMBEDKAR NAGAR (U.P.)- अम्बेड्कर नगर के कवि

कवि का नाम तथा प्रतिनिधि रचनाओं के अंश-
१. राम सहाय मिश्र "कोमल शास्त्री" -
Add c "कोमल शास्त्री"  aption



समन्दर छोड़ आया हूँ मछलियाँ छोड़ आया हूँ
गुलिस्ताँ छोड़ आया हूँ तितलियाँ छोड़ आया हूँ
कलम जब हाथ में लेने चला तो ये ख़्याल आया
किसी के गेसुए ख़म में उँगलियाँ छोड़ आया हूँ ॥


तन किसी के पास है तो मन किसी के पास है
मन किसी के पास है तो तन किसी के पास है
किन्तु मेरी जिन्दगी में क्या विरोधाभास है
न तन ही अपने पास है न मन ही अपने पास है 

द्वारका का द्वार कोई कंस क्क्या सजायेगा
नीर है कि क्षीर कोई हंस ही बताय़ेगा
गाल तो बजाने को बजाते हैं सभी यहाँ
किन्तु बाँसुरी तो कोई कृष्ण ही बजायेगा 

जिन्दगी में कुछ नहीं न तृप्ति है न प्यास है
चाँदनी धुली धुली खुला खुला आकाश है
ज्जिन्दगी है तब तलक कि जब तलक ये साँस है
पहले भी उदास थी और आज भी उदास है 

एक दिन ऐसे वैसे में मर जायेगा
हासिये पर तुझे वक्त कर जायेगा
मेरे पहलू में आ जा खुदा की कसम
तेरा दामन मुहब्बत से भर जायेगा 

उड़ते पंछी का पर्वत पर कोई नहीं ठिकाना है
इस जंगल से उस जंगल तक केवल दौड़ लगाना है
चिता कह रही लाश कह रही मरघट की हर साँस कह रही
आज नहीं तो कल तुझको भी इस दुनिया से जाना है 

चाहता हूँ आँख आँख भर तेरी निहार लूँ
चाहता हूँ सिन्धु सा अथाह तुझे प्यार दूँ
तुम बनो गुलाब की सुगन्धमयी पाँखुरी
मैं उसी की छाँव में ही जिन्दगी गुजार दूँ  




दिनेश कुमार सिं"घायल"
२. दिनेश कुमार सिं"घायल" 


वो आए हैं यहाँ पर रँगबिरंगी मछलियाँ लेकर
हक़ीक़त है यही वो आ गए हैं बिजलियाँ लेकर
ये इक मासूम बच्चा देखता ही रह गया घायल
मगर देखो वो भौंरे उड़ गए है तितलियाँ लेकर ॥

सुख दुख का ताप सहन करना ही जीवन की परिभाषा है
दुख दर्द बाँट लूँ औरों का मेरे मन की अभिलाषा है
छल दम्भ ढोंग भ्रम विकृत अहिइंसा का मैं घोर विरोधी हूँ
जिसका अनुरागी मैं वह सत्पथ संघर्षों की भाषा है 

धीरे धीरे चमन इश्क का बियाबान हो जायेगा
जीवन के मसलों का यूँ ही समाधान हो जायेगा
अपने आतंकी यौवन के बम मत लेकर चला करो
वरना ये घायल दिल अपना मुसलमान हो जायेगा 

सद्भावों सत्कर्मों का आभरण देखता हूँ
रूप ही नहीं निर्मल अन्त:करण देखता हूँ
पावन मन होगा तो मेरी दृष्टि समझ पाओगे
मैं लोगों के चरण नहीं आचरण देखता हूँ 

इक नज़र का कमाल कर देना
तुम खुदा को निहाल कर देना
तुम्हें शवाब मिलेगा जानम
कोई क़ाफ़िर हलाल कर देना 

अपना दामन छुड़ा कर चले जाइए
मेरे दिल को जला कर चले जाइए
इस ज़माने में हर बेवफ़ा की तरह
आप भी मुस्कराकर चले जाइए 

किसी के हाथ में खुद साग़रोमीना नहीं आता
शराबे हुस्न आँखों से जिसे पीना नहीं आता
जो घुट घुट करके साक़ी की अदा देखा किए तरसे
उसे मरना नहीं आता उसे जीना  नहीं आता 

बाबर के वंशज भी ’महान’ हो गए ?
हँसते हुए उपवन भी वीरान हो गए
जिनको था देश प्यारा वे बलिदान हो गए
जिनको था शीश प्यारा मुसलमान हो गए 

हर तरफ़ चीख है ये शोर शराबा जाए
कुछ करो बन्द हो ये ख़ून ख़राबा जाए
जिसको है प्यार मेरे देश से वो रह ले यहाँ
वरना वो रोम मदीने को या काबा जाए 

दुख दर्द प्यार इज़्ज़त जज़्बात नहीं माने
समझाओ चाहे जितना पर बात नहीं माने
क़समें सबूत इनकी देते रहो दुहाई
जो लात का है आदी वो बात नहीं माने 

उसके मगर के आँसू झूठे सभी वादे हैं
ओसामा बिन लादेन को जो पीठ पे लादे हैं
वो बन चुका है सारी दुनिया के लिए ख़तरा
है नाम पाक उसका नापाक़ इरादे हैं 

कुछ खेल प्रेमियों को झाबर लगे अच्छा
कुछ तेल प्रेमियों को डाबर लगे अच्छा
करते हैं सियासत जो मज़हब के नाम पर
उन देशद्रोहियों को बाबर लगे अच्छा 

गाँधी तेरी घोर अहिंसा का जवाब लिख जाऊँगा
बूढ़े भारत के माथे पर मैं शबाब लिख जाऊँगा
इसी सदी में इसी क़लम से मैं ये वादा करता हूँ
बच्चे बच्चे की ज़बान पर इन्क़लाब लिख जाऊँगा 

क्या पता कब मिले कब जुदा हो गए
लोग कहते हैं अब वो ख़ुदा हो गए
आजकल सात पर्दों में रहते हैं वो
जो सियासत से शादीशुदा हो गए 

सारी दुनियी जाग रही है फिर मैं कैसे सो जाऊँ
दुआ करो जीवन का बोझा धीरे धीरे ढो जाऊँ
मेरे बच्चे नौजवान बेरोज़गार लाचार हुए
फिर मैं ऐसे कैसे इतनी जल्दी बूढ़ा हो जाऊँ 

ये मेरा वतन जंग के मैदाँ से कम नहीं
कुछ लोग यहाँ हाथ में तलवार लिए हैं
लगते हैं बदसलूक़ बड़े नाव के माझी
नादान हैं जो हाथ में पतवार लिए हैं 


हर एक हमसफ़र जानेजिगर नहीं होता
इसलिए मेराकोई हमसफ़र नहीं होता
हम भी कुछ आप्के मानिंद चुप रहे होते
हमारा रहबर गर बेख़बर नहीं होता 

खुला रखते दरो दिल दोस्त से पर्दा नहीं करते
न पूरा कर सकें ऐसा कोई वादा नहीं करते
लगी हो आग गुलशन में दरख़्तों पे क़हर बरपा
हम ऐसे वक़्त हुस्नोइश्क़ की चर्चा नहीं करते 

समन्दर से पूछो मछलियों से पूछो
मेरी आँख की इन पुतलियों से पूछो
है क्या मेरे दीवारे दिल पे इबारत
ये शोलों से पूछो बिजलियों से पूछो 

ये तलाक देने की नादानी मत कर
दे करके ये मेहर मेहरबानी मत कर
मेरी जवानी इन बच्चों का क्या होगा?
हरी भरी बगिया में बीरानी मत कर ॥

सभी समान हैं ऐसा नहीं है
हरेक शख्स इक जैसा नहीं है
उसने मुँह फेर लिया ठीक ही है
हमारे हाथ में पैसा नहीं है ॥

किस्से में आग है न कहानी में आग है
क्या कह रहे हो हुस्न के पानी में आग है?
दीवाने से कह दो कि ज़रा होश में रहना
बच के निकल जा उसकी जवानी में आग है ॥

कुछ इधर कुछ उधर देखिए
उनकी तिरछी नजर देखिए
कितने ’घायल’ पड़े हैं यहाँ
हुस्न का ये क़हर देखिए ॥

ये जो दरिया मेरे अश्क़ों का काफ़ला है वो
किसी हमदोस्त से करता नहीं गिला है वो
ये उसकी रोशनी जो जल रहे आँखों के चराग
हुज़ूरेवाला फ़क़त आप की दुआ है वो ॥

उनकी तीरे नज़र देखिए
युँ न हो बेखबर देखिए
देखिए उठ रहा है धुआँ
मेरा दिल मेरा घर देखिए ॥

क्या पता कब मचल जाएगा
हाथ से दिल फिसल जाएगा
तुझको एहसास होगा  तभी
जब मेरा दम निकल जाएगा ॥

खुद्दारियाँ गर अपनी भूले नहीं होते
उसके हसीन ख्वाब में झूले नहीं होते
अब लग रहा है आप  को जो फित्रती बशर
तो आप उसपे आग बबूले नहीं होते ॥

तुम्हारी आँख की मस्ती उतर आयी शराबों में
तुम्हारे होठ की लाली उतर आयी गुलाबों में
इन आँखों के शरारों से जहाँ आग कग जाती
ग़नीमत है यही चेहरा छिपा रक्खा नकाबों में ॥

ज़मीं क्या सातों आसमान पढ़ के आया हूँ
बुते क़ाफ़िर में मैं ईमान पढ़ के आया हूँ
जिसमें मिलती है मुझे नूरे इलाही की झलक
मैं उसके हुस्न का क़ुरआन पढ़ के आया हूँ ॥

कोइ रोता कोइ हँसता कोई नाशाद होता है
उजड़ता है कोई घर तो कोई आबाद होता है
मेरी नाकामियों पे हँस मगर ये भी ज़ेहन में रख
जो मेरा प्यार ठुकराता है वो बरबाद होता है ॥

मैंने जिया है ज़िन्दगी को युँ क़हर के साथ
हाँ पी लिया शराबे ज़ीस्त इस ज़हर के साथ
कर दे हलाक़ क्यूँ मुझे तू दे रहा तलाक़
या दे मेरी दोशीजगी भी इस मेहर के साथ ॥