Wednesday, 15 August 2012

कोमल शास्त्री के कुछ मुक्तक

कोमल शास्त्री के कुछ मुक्तक

जाने ख़ुदा ताउम्र ये मंज़र नहीं दे्खा
मीठा शहद का तुझसा समण्दर नहीं देखा
देखे हैं असलहों के ज़खीरे भी कई बार
लेकिन तेरी निगाह सा खंज़र नहीं देखा ॥

कश्तियाँ डगमगाने लगी हैं
मछलियाँ मुंह चिढ़ाने लगी हैं
अब तो रिश्तों की परछाइयों से
लड़्कियाँ खौफ़ खाने लगी हैं ॥

दर्द जिसने नहीं सहा होगा
गीत उसने नहीं कहा होगा
कोई काँटा ज़रूर दिल में है
अश्क़ ऐसे नहीं बहा होगा ॥

बाहर की सुन चुका हूँ अन्दर की बात कर
भूखों के इस शहर में लंगर की बात कर
होगा बड़ा वो कोमल तो होगा अपने घर का
प्यासा हूँ तू न मुझसे समन्दर की बात कर ॥

अब तो अपनों की मुलाक़ात से डर लगता है
कहीं जाओ तो खुराफ़ात से डर लगता है
कितना किरदार पे हाबी है सियासत कोमल
किसी की दी हुई सौगात से डर लगता है ॥

अच्छी बुरी हर शय यहाँ है लूट जाने के लिए 
ये बहारें आज हैं कल छूट जाने के लिए
जिसपे तुझको नाज़ है कोमल जवानी का बहुत
ये खिलौना भी बना है टूट जाने के लिए

पत्थरों को भी पटा कर दिल लगाना सीखिए
आप अपने आप से ही मुस्कराना सीखिए
ज़िन्दगी को ठीक ढर्रे पर चलाने के लिए
आँसुओं में ही नहीं रस में नहाना सीखिए ॥

हम शोख परिन्दों को उड़ाया नहीं करते
तिनकों के नशेमन भी जलाया नहीं करते
पानी सा बहाते हैं पसीने को मगर हम
किरदार को पानी में बहाया नहीं करते ॥

करते हैं जो इमकान से ज़्यादा नहीं करते
हम दिल को तोड़ने का इरादा नहीं करते
कल किस चमन में कोमल लग जाय हाज़िरी
कलियों से कभी भौंरे वादा नहीं करते ॥

सागर की तरंगों में रवा ढूँढ रहे हैं
आतिश के मकानों में हवा ढूँढ रहे हैं
हद हो गयी इंसान के फ़ित्रत की यहाँ पर
अब लोग ज़हर खा के दवा ढूँढ रहे हैं ॥

कहीं पत्थर कहीं दरिया ज़मीं नहीं मिलती
बात हर सिम्त से अक्सर बनी नहीं मिलती
दिया अंधे की हथेली पे अगर रखे भी
किसी तरह से उसे रोशनी नहीं मिलती ॥

चमन में आग फैली है बुझाने की ज़रूरत है
गुलिस्ताँ राख होता है बचाने की ज़रूरत है
मछलियाँ मर रहीं हैं मर रहीं मुस्कान फूलों की
इन्हें तालाब का पानी बदलने की ज़रूरत है ॥

न ज़ुबाँ ही हिली न इशारे हुए
बाँसुरी के सभी स्वर किनारे हुए
काट कर है पलटने की आदत जिन्हें
न हमारे हुए न तुम्हारे हुए ॥

ज़िन्दगी जीने की खातिर ज़हर रखिए
हौसला पीने का आठों पहर रखिए
कुछ सँवरने की तमन्ना है अगर
आप मंज़िल पर हमेशा नज़र रखिए ॥

कुछ इधर हो गया कुछ उधर हो गया
ये महल बँट के छोटा सा घर हो गया
जिसमें बचपन की यादें तुम्हारी बचीं
वो शहर आजकल खण्डहर हो गया ॥

सफ़र में साथ चलते हैं कदम खींचा नहीं करते
औ अपने साथियों के साथ भी धोखा नहीं करते
हमारा मशविरा शायद तुम्हें कोमल लगे अच्छा 
परिन्दे घर परिन्दों के कभी फूँका नहीं करते ॥

सुख सुविधाओं के झूले में जीवन नहीं सँवरता है
बिना आग का किए सामना सोना नहीं निखरता है
महिमा मण्डित कोमल कोई रातों-रात नहीं होता
पत्थर को मूरत बनने में एक ज़माना लगता है ॥

अच्छे हैं बहुत दूर से आकाश के तारे
जीना है मगर मुश्किल सपनों के सहारे
सागर का सफ़र कोमल कितना ही सुहाना हो
लेकिन वहाँ से लौट के आना है किनारे ॥

एक बीमारी बहुत है पीर पाने के लिए
एक लाचारी बहुत है दिल हिलाने लिए
ढेर बारूदों के कोमल सर बचा सकते नहीं
एक चिनगारी बहुत है घर जलाने के लिए ॥

पत्थर को परिन्दों से उठाया नहीं करते
जलते हुए चराग बुझाया नहीं करते
हैं बुत परस्त लेकिन मबलब की परस्ती में
हम झूठ के कसीदे गाया नहीं करते ॥

गिन गिन विपदायें लिखता हूँ
जग की ज्वालायें लिखता हूँ
राजनीति का भाँड़ नहीं हूँ
कवि  हूँ कविताएं लिखता हूँ ॥

जलती आग बुझा देता है
धरती स्वर्ग बना देता है
राजनीति जब गिरने लगती
तब साहित्य उठा देता है ॥

हम शायरी व्यापार के निस्बत नहीं करते
करते हैं जो भी उसमें कसरत नहीं करते
कोमल जहाँ कला के कद्रदाँ नहीं होते
हम ऐसी महफिलों में शिरकत नहीं करते ॥

शब्दों के साथ कोई शरारत नहीं करते.
अपने लिए ही इनकी ज़ियारत नहीं करते
हम नित्य नए रंग बनाते हैं कलम से
लेकिन कभी रंगों की तिजारत नहीं करते ॥

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