Saturday, 14 May 2011

अहिंसा का नंगा सच

अहिंसा वैसे तो भारतीय चिंतन की धारा में समयी हुई है परन्तु गाँधीजी ने अहिंसा का अतिवादी स्वरूप प्रस्तुत किया । गाँधीजी की अहिंसा व्यावहारिक नहीं है । गाँधी चिंतन यथार्थ से परे है एक दिवा स्वप्न की तरह । इसीलिए गाँधी अनेक बार असफल सिद्ध हुए हैं । सारी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढाने वाले तथा निरस्त्रीकरण की सलाह देने वाले गाँधी की बात को न तो दुनिया ने मानी और न ही उनके चेलों ने ।राजनीतिक पटल पर गाँधीजी पूर्णतया असफल सिद्ध हुए । गाँधीजी न तो उत्क्रिष्ट विचारक थे न राजनेता और न ही राजपुरुष ।गाँधीजी का चिंतन देश के लिए आत्मघाती था ।गाँधीजी की नीतियों पर चलकर देश को आज़ादी न तो मिल सकती थी और न ही मिली । वो तो हमारे देश के वीर क्रान्तिकारी सपूतों के त्याग और बलिदान का प्रतिफल था कि हम आज अज़ाद हैं । गाँधीजी ने तो क्रान्तिकारियों राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस को उपेक्षित किया और उनकी भर्त्सना की । ऐसे गाँधीवाद से तौबा तौबा ।

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